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Sunday, August 19, 2012

World Photography Day...!!!! 19 August 2012



         On 19th August there is "World Photography Day" so I get my camera and took some photos of sisters daughter(only 4 months)....... But sister's strict warning that dont put her photos on the net so cant posted here.... So Sorry.......

           In the morning there is Mutton in home so lunch is so heavy... after that. I watched movie "Paranormal Activity 3". Its horror but not horror as much in part 1st... In the evening its soooo boring because what to do I don't understand......  So Played a songs loudly on PC and do surfing on the net....At the end the weekly off is little bit boring.....
   

राकेशचा बिर्थ डे 17 Aug 12

16 ऑगस्ट 2012 रात्री 12 वाजता म्हणजे 17 ऑगस्ट  राकेशचा बिर्थ डे.... रामने केक आणला होताच. कंपनी मधून घरी आलो आणि आवरून PC वर बसलो. तोवर रात्री 10:30 च्या दरम्यान  राकेशचा फोन आला. त्याचे दुकानात काहीतरी काम होते. मग ते काम करून येउपर्यंत 11:45 झालेले. 12 वाजता रामने केक आणला आणि तो राकेशने कापला....

त्याची काही छायाचित्र 

                                                                 बिर्थ डे केक.....

                                                       सत्कारमूर्ती बरोबर दंगा...
                                                        सत्कारमूर्ती बरोबर फोटो....
      

Tuesday, August 14, 2012

वन्दे मातरम Vs जन गण मन

 

 India google वर टाईप केले आणि मला भरपूर लिंक मिळाल्या .... विकिपीडिया साईट वर चेक केले......  Anthem आणि National song..... या दोन्हीचा अर्थ काळाला नाही म्हणून परत गुगल वर search केले diffrence between Anthem and National song आणि मला खालील माहिती मिळाली.....

 

जन गण मन की असलियत सब को बताएं - Reality of Jan Gan Man National Anthem

रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

वन्दे मातरम Vs जन गण मन


वन्दे मातरम की कहानी
ये वन्दे मातरम नाम का जो गीत है जिसे हम राष्ट्रगीत के रूप में जानते हैं उसे बंकिम चन्द्र चटर्जी ने 7 नवम्बर 1875 को लिखा था | बंकिम चन्द्र चटर्जी बहुत ही क्रन्तिकारी विचारधारा के व्यक्ति थे | देश के साथ-साथ पुरे बंगाल में उस समय अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आन्दोलन चल रहा था और एक बार ऐसे ही विरोध आन्दोलन में भाग लेते समय इन्हें बहुत चोट लगी और बहुत से उनके दोस्तों की मृत्यु भी हो गयी | इस एक घटना ने उनके मन में ऐसा गहरा घाव किया कि उन्होंने आजीवन अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का संकल्प ले लिया उन्होंने | बाद में उन्होंने एक उपन्यास लिखा जिसका नाम था "आनंदमठ", जिसमे उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ बहुत कुछ लिखा, उन्होंने बताया कि अंग्रेज देश को कैसे लुट रहे हैं, ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से
कितना पैसा ले के जा रही है, भारत के लोगों को वो कैसे मुर्ख बना रहे हैं, ये सब बातें उन्होंने उस किताब में लिखी | वो उपन्यास उन्होंने जब लिखा तब अंग्रेजी सरकार ने उसे प्रतिबंधित कर दिया | जिस प्रेस में छपने के लिए वो गया वहां अंग्रेजों ने ताला लगवा दिया | तो बंकिम दा ने उस उपन्यास को कई टुकड़ों में बांटा और अलग-अलग जगह उसे छपवाया औए फिर सब को जोड़ के प्रकाशित करवाया | अंग्रेजों ने उन सभी प्रतियों को जलवा दिया फिर छपा और फिर जला दिया गया, ऐसे करते करते सात वर्ष के बाद 1882 में वो ठीक से छ्प के बाजार में आया और उसमे उन्होंने जो कुछ भी लिखा उसने पुरे देश में एक लहर पैदा किया | शुरू में तो ये बंगला में लिखा गया था, उसके बाद ये हिंदी में अनुवादित हुआ और उसके बाद, मराठी, गुजराती और अन्य भारतीय भाषाओँ में ये छपी और वो भारत की ऐसी पुस्तक बन गया जिसे रखना हर क्रन्तिकारी के लिए गौरव की बात हो गयी थी | इसी पुस्तक में उन्होंने जगह जगह वन्दे मातरम का घोष किया है और ये उनकी भावना थी कि लोग भी ऐसा करेंगे | बंकिम बाबु की एक बेटी थी जो ये कहती थी कि आपने इसमें बहुत कठिन शब्द डाले है और ये लोगों को पसंद नहीं आयेगी तो बंकिम बाबु कहते थे कि अभी तुमको शायद समझ में नहीं आ रहा है लेकिन ये गीत कुछ दिन में देश के हर जबान पर होगा, लोगों में जज्बा पैदा करेगा और ये एक दिन इस देश का राष्ट्रगीत बनेगा | ये गीत देश का राष्ट्रगीत बना लेकिन ये देखने के लिए बंकिम बाबु जिन्दा नहीं थे लेकिन जो उनकी सोच थी वो बिलकुल सही साबित हुई| 1905 में ये वन्दे मातरम इस देश का राष्ट्रगीत बन गया | 1905 में क्या हुआ था कि अंग्रेजों की सरकार ने बंगाल का बटवारा कर दिया था | अंग्रेजों का एक अधिकारी था कर्जन जिसने बंगाल को दो हिस्सों में बाट दिया था, एक पूर्वी बंगाल और एक पश्चिमी बंगाल | इस बटवारे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये था कि ये धर्म के नाम पर हुआ था, पूर्वी बंगाल मुसलमानों के लिए था और पश्चिमी बंगाल हिन्दुओं के लिए, इसी को हमारे देश में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है | ये देश में धर्म के नाम पर पहला बटवारा था उसके पहले कभी भी इस देश में ऐसा नहीं हुआ था, मुसलमान शासकों के समय भी ऐसा नहीं हुआ था | खैर ...............इस बंगाल बटवारे का पुरे देश में जम के विरोध हुआ था , उस समय देश के तीन बड़े क्रांतिकारियों लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पल ने इसका जम के विरोध किया और इस विरोध के लिए उन्होंने वन्दे मातरम को आधार बनाया | और 1905 से हर सभा में, हर कार्यक्रम में ये वन्देमातरम गाया जाने लगा | कार्यक्रम के शुरू में भी और अंत में भी | धीरे धीरे ये इतना प्रचलित हुआ कि अंग्रेज सरकार इस वन्दे मातरम से चिढने लगी | अंग्रेज जहाँ इस गीत को सुनते, बंद करा देते थे और और गाने वालों को जेल में डाल देते थे, इससे भारत के क्रांतिकारियों को और ज्यादा जोश आता था और वो इसे और जोश से गाते थे | एक क्रन्तिकारी थे इस देश में जिनका नाम था खुदीराम बोस, ये पहले क्रन्तिकारी थे जिन्हें सबसे कम उम्र में फाँसी की सजा दी गयी थी | मात्र 14 साल की उम्र में उसे फाँसी के फंदे पर लटकाया गया था और हुआ ये कि जब खुदीराम बोस को फाँसी के फंदे पर लटकाया जा रहा था तो उन्होंने फाँसी के फंदे को अपने गले में वन्दे मातरम कहते हुए पहना था | इस एक घटना ने इस गीत को और लोकप्रिय कर दिया था और इस घटना के बाद जितने भी क्रन्तिकारी हुए उन सब ने जहाँ मौका मिला वहीं ये घोष करना शुरू किया चाहे वो भगत सिंह हों, राजगुरु हों, अशफाकुल्लाह हों, चंद्रशेखर हों सब के जबान पर मंत्र हुआ करता था | ये वन्दे मातरम इतना आगे बढ़ा कि आज इसे देश का बच्चा बच्चा जानता है | कुछ वर्ष पहले इस देश के सुचना विभाग (Information bureau) ने एक सर्वे कराया जिसमे देश के लोगों से ये पूछा था कि देश का कौन सा गीत सबसे पसंद है आपको, तो सबसे ज्यादा लोगों ने वन्दे मातरम को पसंद किया था और फिर इसी विभाग ने पाकिस्तान और बंग्लादेश में यही सर्वे कराया तो वहां भी ये सबसे लोकप्रिय पाया गया था | इंग्लैंड की एक संस्था है बीबीसी उसने भी अपने सर्वे में पाया कि वन्दे मातरम विश्व का दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत है |    

जन गण मन की कहानी
 सन 1911 तक भारत की राजधानी बंगाल हुआ करता था। सन 1905 में जब बंगाल विभाजन को लेकर अंग्रेजो के खिलाफ बंग-भंग आन्दोलन के विरोध में बंगाल के लोग उठ खड़े हुए तो अंग्रेजो ने अपने आपको बचाने के लिए के कलकत्ता से हटाकर राजधानी को दिल्ली ले गए और 1911 में दिल्ली को राजधानी घोषित कर दिया। पूरे भारत में उस समय लोग विद्रोह से भरे हुए थे तो अंग्रेजो ने अपने इंग्लॅण्ड के राजा को भारत आमंत्रित किया ताकि लोग शांत हो जाये। इंग्लैंड का राजा जोर्ज पंचम 1911 में भारत में आया। रविंद्रनाथ टैगोर पर दबाव बनाया गया कि तुम्हे एक गीत जोर्ज पंचम के स्वागत में लिखना ही होगा।

उस समय टैगोर का परिवार अंग्रेजों के काफी नजदीक हुआ करता था, उनके परिवार के बहुत से लोग ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम किया करते थे, उनके बड़े भाई अवनींद्र नाथ टैगोर बहुत दिनों तक ईस्ट इंडिया कंपनी के कलकत्ता डिविजन के निदेशक (Director) रहे। उनके परिवार का बहुत पैसा ईस्ट इंडिया कंपनी में लगा हुआ था। और खुद रविन्द्र नाथ टैगोर की बहुत सहानुभूति थी अंग्रेजों के लिए। रविंद्रनाथ टैगोर ने मन से या बेमन से जो गीत लिखा उसके बोल है "जन गण मन अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता"। इस गीत के सारे के सारे शब्दों में अंग्रेजी राजा जोर्ज पंचम का गुणगान है, जिसका अर्थ समझने पर पता लगेगा कि ये तो हकीक़त में ही अंग्रेजो की खुशामद में लिखा गया था।

इस राष्ट्रगान का अर्थ कुछ इस तरह से होता है "भारत के नागरिक, भारत की जनता अपने मन से आपको भारत का भाग्य विधाता समझती है और मानती है। हे अधिनायक (Superhero) तुम्ही भारत के भाग्य विधाता हो। तुम्हारी जय हो ! जय हो ! जय हो ! तुम्हारे भारत आने से सभी प्रान्त पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा मतलब महारास्त्र, द्रविड़ मतलब दक्षिण भारत, उत्कल मतलब उड़ीसा, बंगाल आदि और जितनी भी नदिया जैसे यमुना और गंगा ये सभी हर्षित है, खुश है, प्रसन्न है , तुम्हारा नाम लेकर ही हम जागते है और तुम्हारे नाम का आशीर्वाद चाहते है। तुम्हारी ही हम गाथा गाते है। हे भारत के भाग्य विधाता (सुपर हीरो ) तुम्हारी जय हो जय हो जय हो। "

जोर्ज पंचम भारत आया 1911 में और उसके स्वागत में ये गीत गाया गया। जब वो इंग्लैंड चला गया तो उसने उस जन गण मन का अंग्रेजी में अनुवाद करवाया। क्योंकि जब भारत में उसका इस गीत से स्वागत हुआ था तब उसके समझ में नहीं आया था कि ये गीत क्यों गाया गया और इसका अर्थ क्या है। जब अंग्रेजी अनुवाद उसने सुना तो वह बोला कि इतना सम्मान और इतनी खुशामद तो मेरी आज तक इंग्लॅण्ड में भी किसी ने नहीं की। वह बहुत खुश हुआ। उसने आदेश दिया कि जिसने भी ये गीत उसके (जोर्ज पंचम के) लिए लिखा है उसे इंग्लैंड बुलाया जाये। रविन्द्र नाथ टैगोर इंग्लैंड गए। जोर्ज पंचम उस समय नोबल पुरस्कार समिति का अध्यक्ष भी था।

उसने रविन्द्र नाथ टैगोर को नोबल पुरस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया। तो रविन्द्र नाथ टैगोर ने इस नोबल पुरस्कार को लेने से मना कर दिया। क्यों कि गाँधी जी ने बहुत बुरी तरह से रविन्द्रनाथ टेगोर को उनके इस गीत के लिए खूब डांटा था। टैगोर ने कहा की आप मुझे नोबल पुरस्कार देना ही चाहते हैं तो मैंने एक गीतांजलि नामक रचना लिखी है उस पर मुझे दे दो लेकिन इस गीत के नाम पर मत दो और यही प्रचारित किया जाये क़ि मुझे जो नोबेल पुरस्कार दिया गया है वो गीतांजलि नामक रचना के ऊपर दिया गया है। जोर्ज पंचम मान गया और रविन्द्र नाथ टैगोर को सन 1913 में गीतांजलि नामक रचना के ऊपर नोबल पुरस्कार दिया गया।

रविन्द्र नाथ टैगोर की ये सहानुभूति ख़त्म हुई 1919 में जब जलिया वाला कांड हुआ और गाँधी जी ने लगभग गाली की भाषा में उनको पत्र लिखा और कहा क़ि अभी भी तुम्हारी आँखों से अंग्रेजियत का पर्दा नहीं उतरेगा तो कब उतरेगा, तुम अंग्रेजों के इतने चाटुकार कैसे हो गए, तुम इनके इतने समर्थक कैसे हो गए ? फिर गाँधी जी स्वयं रविन्द्र नाथ टैगोर से मिलने गए और बहुत जोर से डाटा कि अभी तक तुम अंग्रेजो की अंध भक्ति में डूबे हुए हो ? तब जाकर रविंद्रनाथ टैगोर की नीद खुली। इस काण्ड का टैगोर ने विरोध किया और नोबल पुरस्कार अंग्रेजी हुकूमत को लौटा दिया। सन 1919 से पहले जितना कुछ भी रविन्द्र नाथ टैगोर ने लिखा वो अंग्रेजी सरकार के पक्ष में था और 1919 के बाद उनके लेख कुछ कुछ अंग्रेजो के खिलाफ होने लगे थे।

रविन्द्र नाथ टेगोर के बहनोई, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी लन्दन में रहते थे और ICS ऑफिसर थे। अपने बहनोई को उन्होंने एक पत्र लिखा था (ये 1919 के बाद की घटना है) । इसमें उन्होंने लिखा है कि ये गीत 'जन गण मन' अंग्रेजो के द्वारा मुझ पर दबाव डलवाकर लिखवाया गया है। इसके शब्दों का अर्थ अच्छा नहीं है। इस गीत को नहीं गाया जाये तो अच्छा है। लेकिन अंत में उन्होंने लिख दिया कि इस चिठ्ठी को किसी को नहीं दिखाए क्योंकि मैं इसे सिर्फ आप तक सीमित रखना चाहता हूँ लेकिन जब कभी मेरी म्रत्यु हो जाये तो सबको बता दे। 7 अगस्त 1941 को रबिन्द्र नाथ टैगोर की मृत्यु के बाद इस पत्र को सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने ये पत्र सार्वजनिक किया, और सारे देश को ये कहा क़ि ये जन गन मन गीत न गाया जाये।

1941 तक कांग्रेस पार्टी थोड़ी उभर चुकी थी। लेकिन वह दो खेमो में बट गई। जिसमे एक खेमे के समर्थक बाल गंगाधर तिलक थे और दुसरे खेमे में मोती लाल नेहरु थे। मतभेद था सरकार बनाने को लेकर। मोती लाल नेहरु चाहते थे कि स्वतंत्र भारत की सरकार अंग्रेजो के साथ कोई संयोजक सरकार (Coalition Government) बने। जबकि गंगाधर तिलक कहते थे कि अंग्रेजो के साथ मिलकर सरकार बनाना तो भारत के लोगों को धोखा देना है। इस मतभेद के कारण लोकमान्य तिलक कांग्रेस से निकल गए और उन्होंने गरम दल बनाया। कोंग्रेस के दो हिस्से हो गए। एक नरम दल और एक गरम दल।

गरम दल के नेता थे लोकमान्य तिलक जैसे क्रन्तिकारी। वे हर जगह वन्दे मातरम गाया करते थे। और नरम दल के नेता थे मोती लाल नेहरु (यहाँ मैं स्पष्ट कर दूँ कि गांधीजी उस समय तक कांग्रेस की आजीवन सदस्यता से इस्तीफा दे चुके थे, वो किसी तरफ नहीं थे, लेकिन गाँधी जी दोनों पक्ष के लिए आदरणीय थे क्योंकि गाँधी जी देश के लोगों के आदरणीय थे)। लेकिन नरम दल वाले ज्यादातर अंग्रेजो के साथ रहते थे। उनके साथ रहना, उनको सुनना, उनकी बैठकों में शामिल होना। हर समय अंग्रेजो से समझौते में रहते थे। वन्देमातरम से अंग्रेजो को बहुत चिढ होती थी। नरम दल वाले गरम दल को चिढाने के लिए 1911 में लिखा गया गीत "जन गण मन" गाया करते थे और गरम दल वाले "वन्दे मातरम"।

नरम दल वाले अंग्रेजों के समर्थक थे और अंग्रेजों को ये गीत पसंद नहीं था तो अंग्रेजों के कहने पर नरम दल वालों ने उस समय एक हवा उड़ा दी कि मुसलमानों को वन्दे मातरम नहीं गाना चाहिए क्यों कि इसमें बुतपरस्ती (मूर्ति पूजा) है। और आप जानते है कि मुसलमान मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी है। उस समय मुस्लिम लीग भी बन गई थी जिसके प्रमुख मोहम्मद अली जिन्ना थे। उन्होंने भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि जिन्ना भी देखने भर को (उस समय तक) भारतीय थे मन,कर्म और वचन से अंग्रेज ही थे उन्होंने भी अंग्रेजों के इशारे पर ये कहना शुरू किया और मुसलमानों को वन्दे मातरम गाने से मना कर दिया। जब भारत सन 1947 में स्वतंत्र हो गया तो जवाहर लाल नेहरु ने इसमें राजनीति कर डाली। संविधान सभा की बहस चली। संविधान सभा के 319 में से 318 सांसद ऐसे थे जिन्होंने बंकिम बाबु द्वारा लिखित वन्देमातरम को राष्ट्र गान स्वीकार करने पर सहमति जताई।

बस एक सांसद ने इस प्रस्ताव को नहीं माना। और उस एक सांसद का नाम था पंडित जवाहर लाल नेहरु। उनका तर्क था कि वन्दे मातरम गीत से मुसलमानों के दिल को चोट पहुचती है इसलिए इसे नहीं गाना चाहिए (दरअसल इस गीत से मुसलमानों को नहीं अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचती थी)। अब इस झगडे का फैसला कौन करे, तो वे पहुचे गाँधी जी के पास। गाँधी जी ने कहा कि जन गन मन के पक्ष में तो मैं भी नहीं हूँ और तुम (नेहरु ) वन्देमातरम के पक्ष में नहीं हो तो कोई तीसरा गीत तैयार किया जाये। तो महात्मा गाँधी ने तीसरा विकल्प झंडा गान के रूप में दिया "विजयी विश्व तिरंगा प्यारा झंडा ऊँचा रहे हमारा"। लेकिन नेहरु जी उस पर भी तैयार नहीं हुए।

नेहरु जी का तर्क था कि झंडा गान ओर्केस्ट्रा पर नहीं बज सकता और जन गन मन ओर्केस्ट्रा पर बज सकता है। उस समय बात नहीं बनी तो नेहरु जी ने इस मुद्दे को गाँधी जी की मृत्यु तक टाले रखा और उनकी मृत्यु के बाद नेहरु जी ने जन गण मन को राष्ट्र गान घोषित कर दिया और जबरदस्ती भारतीयों पर इसे थोप दिया गया जबकि इसके जो बोल है उनका अर्थ कुछ और ही कहानी प्रस्तुत करते है, और दूसरा पक्ष नाराज न हो इसलिए वन्दे मातरम को राष्ट्रगीत बना दिया गया लेकिन कभी गया नहीं गया। नेहरु जी कोई ऐसा काम नहीं करना चाहते थे जिससे कि अंग्रेजों के दिल को चोट पहुंचे, मुसलमानों के वो इतने हिमायती कैसे हो सकते थे जिस आदमी ने पाकिस्तान बनवा दिया जब कि इस देश के मुसलमान पाकिस्तान नहीं चाहते थे, जन गण मन को इस लिए तरजीह दी गयी क्योंकि वो अंग्रेजों की भक्ति में गाया गया गीत था और वन्देमातरम इसलिए पीछे रह गया क्योंकि इस गीत से अंगेजों को दर्द होता था।

बीबीसी ने एक सर्वे किया था। उसने पूरे संसार में जितने भी भारत के लोग रहते थे, उनसे पुछा कि आपको दोनों में से कौन सा गीत ज्यादा पसंद है तो 99 % लोगों ने कहा वन्देमातरम। बीबीसी के इस सर्वे से एक बात और साफ़ हुई कि दुनिया के सबसे लोकप्रिय गीतों में दुसरे नंबर पर वन्देमातरम है। कई देश है जिनके लोगों को इसके बोल समझ में नहीं आते है लेकिन वो कहते है कि इसमें जो लय है उससे एक जज्बा पैदा होता है।

तो ये इतिहास है वन्दे मातरम का और जन गण मन का। अब ये आप को तय करना है कि आपको क्या गाना है ?
Reference: http://www.socialservicefromhome.com/2011/08/reality-of-jan-gan-man-national-anthem.html?showComment=1344929791333#c7181800760586491765 

Monday, August 13, 2012

भारतीय.....भारतीय म्हंजी काय व भौ ? मराठी मुव्ही



 ऑफिस मधून घरी येतो न येतो तोच राकेश आला. काल ठरवलेले कि भारतीय चित्रपट पहायला जायचे. आम्ही दिघे कॉम्पुटरवर   perfume movie पहिला. तोवर 9 वाजले शो 9:30 चा होता.... रामला पण फोन करून बोलावून घेतले. कधीनही ते सगळे वेळेवर गेलेलो मुवि पहायला. 

आणि चित्रपट चालू झाला.....

भारतीय मराठी मुव्ही

         चित्रपट एका अडनेड गावावर घेतला आहे. जे महाराष्ट्र आणि कर्नाटक सीमेवर वसलेले दाखवले आहे ते गुगलवर देखील शोधून सापडत नसत. सीमेवर असल्यामुळे कोणतेच राज्य या गावाची दाखल घेत नसते. तिथे शहरातून युवक (सुबोध भावे ) येतो कारण तिथे त्याचे घर असते. गावात पहिल्या पासूनच दोन विरोधी गट दाखवलेले आहेत. चित्रपट खरा सुरू होतो जेव्हा युवक त्या गावात येतो. त्याला त्याचे घर विकायाचे असते. त्यासाठी तो महाराष्ट्र कर्नाटक राज्यात 7/12 उतार्यासाठी चाक्करा मारत बसतो. पण त्याला कळते कि हे गाव कुठल्याच राज्याच्या हद्दीत नाही. म्हणजे हे एक स्वतंत्र राष्ट्र आहे.

   आता भारतात एक दुसरे राष्ट्र स्थापन करण्याच्या तयारीस सर्व गाववाले लागतात. पुढे काय काय काय होते ते मी सांगत नाही त्यापेक्षा ते तुम्हीच पहा....

 कॉमेडी असून तितकाच serious विषय या चित्रपटाच्या निर्मात्याने निवडला आहे आणि लोकांपर्यंत पोचावालेला आहे... तुम्ही हा चित्रपट जरूर पहा.........




Saturday, August 11, 2012

प्रिन्स ऑफ पर्शिया पार्ट 3 बिग फायनल बॉस

प्रिन्स ऑफ पर्शिया पार्ट 3 फायनल बॉस


         प्रिन्स आता जमिनीखाली पाताळात आला होता. आणि प्रिन्स सैतानी रूपान्तरण  होते.  राजकुमारी फरहाला वजिराने कैद केले होते. प्रिन्सला काहीही करून वर यायचे होते आणि राजकुमारीला वाचवायचे होते. प्रिन्स अडकला होता त्याने मिळेल त्या ठिकाणातून वात  काढली; पाताळातील सैतानाचा मुकाबला करत करत तो वर येऊ लागला. तो एका अंधार्या गुहेत आला त्याला तिथे एक तलवार मिळाली. ती तलवार तर त्याच्या वडिलांची म्हणजे राजाची होती. 
      
     तिथेच त्याला एक प्रेतपण दिसले. त्याच्या जवळ गेल्यावर  प्रिन्सच्या पायाखालची जमीन सरकली ते प्रेत तर त्याच्या वडिलांचे होते. प्रिन्स रडू लागला. त्याच्या वडिलांना वजिराने मारले होते... 

     आता प्रिन्सला त्याच्या स्वतहाची आठवण झाली. त्याने बदला घेण्यासाठी तलवार उचलली आणि त्याच्या सैतानी रुपाला झुगारून तो त्याच्या  रूपात आला होता.
      
        
 


प्रिन्सने अंधारातून वाट काढत काढत महालात प्रवेश lकेला. पुढे तो एका गोलाकार आकाराच्या खोलीमध्ये आला. तो जासा त्या खोलीत प्रवेश करतो तशी खालची जमीन वर येऊ लागते ...

जस जसा तो वर येऊ लागतो तास तसा त्याला वजीर आणि फरहा  दिसु लागतात. वजिराने तिला बांधून ठेवले असते. आता त्यांच्यात  तुंबळ युद्ध सुरु होते ... प्रिन्स वजिराच्या दोन्ही नांग्या कापून टाकतो. पण वजीर जवळच्या सगळ्या  भिंती पाडतो. भिंतीचे भाग हवेत तरंगू लागतात  आणि वजीर  उंच आकाशात जातो. आता प्रिन्स कसा वजिराचा खात्मा करतो ते प्रत्यक्षातच पहा ......





लवकरच
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Wednesday, August 8, 2012

प्रिन्स ऑफ पर्शिया पार्ट 3 बिग बॉस 3





                प्रिन्सने घोडागाडी पकडली आणि तो वर्यावर स्वार झाला. तो आता मिळेल त्या मार्गाने घोडागाडी पळवू लागला. वाटेत येणार्या सर्व शत्रूचा फडशा पडत पुढे निघाला.पण तो एकटा नव्हता त्याच्या मागे एक राक्षस घोडागाडी घेऊन लागला होता.
  
 


               त्या रक्षसाची आणि प्रिन्सची घोडागाडी जवळ जवळ आली. इतक्यात प्रिन्सने आपली घोडागाडी सोडून त्या रक्षसाच्या अंगावर झेप घेतली; तसे दोघे खाली पडले आणि गडगडत एका रिंगणात येऊन पोचले. पण तो रक्षस एकता नव्हता त्याचे एक दुसरे रूप तयार झाले होते. आत्ता  प्रिन्स आणि ते दोन राक्षस.





त्या तिघात तुंबळ युद्ध सुरु झाले. कसेबसे प्रिन्सने एका राक्षसाला जवळ जवळ संपवले पण आणखीन एक राक्षस होता तो प्रिन्सवर धाऊन येणार इतक्यात...... राजकुमारी फरहा मदतीला धाऊन आली आणि तिने एका बाणात त्या राक्षसाला यमसदनी पाठवले. प्रिन्स व राजकुमारी ते दोघे आता किल्ल्याच्या दिशेने चालले.... ते किल्ल्यात पोचले पण हजारांच्या संख्येने राक्षसांनी त्याना चहुबाजूनी घेरले.

           पण तोवर सर्व लोक त्या किल्ल्यात आले होते. सर्व लोकांनी राक्षसांबरोबर युद्ध सुरु केले. प्रिन्स आणि राजकुमारीने त्यातून वात  काढत किल्ल्याच्या प्रवेश केला आणि दरवाजा अडकवलेला दोर कापून टाकला; त्यामुले ते सुखरूप किल्ल्यात पोचले. पण नेहमी प्रमाणे राजकुमारीने घाई केली आणि एका दरवाज्यातून आत गेल्यामुळे तो दरवाजा बंद झाला आणि प्रिन्स बाहेरच अडकला. ती राजकुमारी दरवाजा उघडण्यासाठी शोधाशोध करू लागली तोवर प्रिन्सवर राक्षसांनी हमाला चढवला. प्रिन्स सर्वाना तोड देत होता आणि मारत होता; तोवर दार उघडले आणि प्रिन्स सुखरूप आत आला...



                 किल्ल्यात ते किल्ल्याच्या आत पर्यंत पोचले पण तिथे त्याचा शत्रू आला तो म्हणजे वजीर. त्यानेच हे सगळे घडवून आणले  होते. पण सैतानी टाकती मुले तो एका भयानक राक्षसात रुपांतरीत झालेला. त्याने राजकुमारीला बंदी केले आणि प्रिन्सला पाताळात फेकून दिले. 

प्रिन्स खाली पडत होता तसा त्याच्या आतील सैतान जागा झाला. आणि तो सुखरूप एका भुयारी मार्गात पोचला.



आता राजकुमारीला प्रिन्स वाचवू शकेल ???   प्रिन्स परत आपले राज्य मिळवू शकेल????
पुढे काय होणार ????

Monday, August 6, 2012

प्रिन्स ऑफ पर्शिया पार्ट 3 बिग बॉस 2


 प्रिन्स आता भुयारी मार्गात शिरला होता पण त्याचे रूप पालटले होते तो एका सैताना मध्ये रुपांतरीत झालेला. पण या रुपात त्याला भरमसाठ ताकत मिळालेली असते पण थोड्यावेळापुरती...

तो एकावर एक शत्रूवर मात करत दुसर्या राक्षसा  पर्यंत पोचतो.... आधीच्या लेवल मध्ये  भारताची राजकुमारीने ( फरहा ) त्याचा जीव वाचवलेला असतो. पण तिने प्रिन्सला या रुपात कधीच पाहिलेले नाही आहे...


  राजकुमारी ( फरहा )

प्रिन्सचे सैतानी रूप


 प्रिन्स ऑफ पर्शिया मधला दुसरा राक्षस.... राक्षस नाही तर ती राक्षसिनच  होती......

   

हिला हारावन्यास काही जास्त वेळ लावला नाही प्रिन्सने.... पण जे व्हायचे नको होते तेच झाले राजकुमारीने त्याला या रुपात पहिले....त्यामुळे राजकुमारी नाराज होती... तिला कळेना कि याच्यावर विश्वास ठेवावा कि नको... पण  प्रिन्सने घडलेली सर्व हकीकत सांगितली. "तो नावेतून येत असताना त्याच्यावर हमाला झाला आणि त्याची मैत्रीण कैलीना शत्रूच्या ताब्यात अडकली आणि याला त्यातच हा शाप मिलाला"....

                                                                 मैत्रीण कैलीना

राजकुमारीला थोडेफार ते पटले.. मग ते दोघे लोकांचा जीव वाचवायला गेले.... यात राजकुमारी दुसर्या मार्गाने गेली आणि  प्रिन्स दुसर्या. तो आगीत सापडलेल्या  लोकाना वाचवायला गेला खरा पण स्वताहा अडकला..

जिथे अडकलेला तिथे एक मोठा पुतळा आणि मोठा दरवाजा होता. तो मोठा पुतळा त्या दरवाज्यावर आपटून तो दरवाजा मोडायचा होता.


बराच प्रयत्न केला आणि शेवटी त्याला यश आले. सगळे लोक मुक्त झाले.....


पण प्रिन्सला एवध्यात थांबायचे नव्हते त्याने घोडागाडी पकडली आणि वार्यावर स्वार झाला.....


तो कुठे निघाला आहे ???